UGC Controversy: यूजीसी ने देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने और समानता लाने के लिए नए नियम लागू किए है. हालांकि, इन नियमों का विरोध अब अगड़ी जाति के लोगों द्वारा किया जा रहा है, जिससे बीजेपी के नेता बेचैन है.दूसरी तरफ, विपक्षी दल इस मुद्दे पर पूरी तरह से खामोश है.अब सबसे सवाल उठता है कि विपक्ष की चुप्पी एक रणनीतिक कदम है या फिर यह उनकी सियासी मजबूरी है? क्या वे इस मुद्दे पर अपनी राय रखने से बच रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है, या फिर वे इस मुद्दे को उठाने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे हैं?

खामोशी मजबूरी है या रणनीति?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसका उद्देश्य यूनिवर्सिटी कैंपस और कॉलेज में समानता लाना है. हालांकि, अगड़ी जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ और वैश्य) के लोग इसके खिलाफ हैं और सड़क पर उतर आए हैं.इस मुद्दे पर बीजेपी नेताओं के सामने एक बड़ा धर्म संकट खड़ा हो गया है, जिससे उनकी सियासी बेचैनी बढ़ रही है. वहीं दूसरी तरफ, विपक्ष ने पूरी तरह से चुप्पी अख्तियार कर रखी है, न तो वह इसका विरोध कर रहे हैं और न ही खुलकर समर्थन में खड़े हो रहे है.विपक्ष की इस चुप्पी के पीछे की वजह क्या है? क्या यह एक रणनीतिक कदम है या फिर सियासी मजबूरी? क्या वे इस मुद्दे पर अपनी राय रखने से बच रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है, या फिर वे इस मुद्दे को उठाने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे हैं?

शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने खड़े किए सवाल
यूजीसी विवाद पर विपक्षी दलों की चुप्पी ने सबको हैरान कर दिया है.नए नियम का न तो वे खुलकर समर्थन कर रहे हैं और न ही विरोध करते नज़र आ रहे हैं.कांग्रेस, सपा, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, बसपा जैसे प्रमुख विपक्षी दल इस मुद्दे पर खामोश हैं.शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने जरूर सवाल खड़े किए हैं और नए नियम को वापस लेने की गुहार लगाई है, लेकिन उनके अलावा किसी भी विपक्षी नेता का कोई बयान सामने नहीं आया है.

कांग्रेस ने भी साधी चुप्पी
कांग्रेस की चुप्पी ने सबको हैरान कर दिया है.भाजपा सरकार के हर फैसले पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस यूजीसी विवाद पर खामोश है.कांग्रेस के पूर्व सांसद और पार्टी महासचिव जितेंद्र सिंह अलवर ने कहा कि यूजीसी के नए नियम छात्रों को आपस में बांटने का प्रयास है, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है.हालांकि, जितेंद्र सिंह के अलावा कांग्रेस के किसी बड़े नेता का कोई बयान नहीं आया है.न तो राहुल गांधी और न ही पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस पर कोई टिप्पणी की है.एक कांग्रेस नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस की चुप्पी के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है.उनका कहना है कि राहुल गांधी का पूरा फोकस दलित और ओबीसी वोटों पर है, और नए नियम उनके हित में हैं.इसलिए कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप है.
सपा भी है इस विवाद पर चुप
कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि उनकी पार्टी की चुप्पी के दो कारण हैं. पहला, नए नियम दलित और ओबीसी वर्ग के हित में हैं, जो कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं.दूसरा, कांग्रेस मोदी सरकार के इस फैसले में खुद को शामिल नहीं करना चाहती, ताकि उन्हें अनावश्यक रूप से सियासी विवाद में न फंसना पड़े.
इधर, सपा ने यूजीसी विवाद पर अपनी चुप्पी बनाए रखी है.अखिलेश यादव की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है, और पार्टी ने अपने प्रवक्ताओं को निर्देश दिया है कि वे इस मुद्दे पर कोई राय न दें.सपा की रणनीति अखिलेश यादव के बयान के बाद ही स्पष्ट होगी.

सियासी समीकरण बिगड़ने का है खतरा?
सपा के एक प्रवक्ता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी यूजीसी के नए नियमों का विरोध नहीं करना चाहती क्योंकि इससे उनके पीडीए समीकरण को नुकसान हो सकता है. सपा का मानना है कि यूजीसी का फैसला सामाजिक न्याय के हित में है, लेकिन सवर्ण जातियों के विरोध को देखते हुए पार्टी ने चुप रहना ही बेहतर समझा है.
विपक्षी दलों की चुप्पी को उनकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.सपा, बसपा, आरजेडी और कांग्रेस सभी इस मुद्दे पर खामोश हैं.उनका मानना है कि यूजीसी के नए नियम दलित और ओबीसी वर्ग के हित में हैं, और वे इस मुद्दे पर बीजेपी को ही निपटने देना चाहते हैं.
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