Supreme court:सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले लिया है और फैंसले में उन्होंने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू, बौद्ध या सिख धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होता है, तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है. यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पिछले फैसले को बरकरार रखते हुए दिया गया है.हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है और उसके अनुसार जीवन जीता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता. तो चलिए आपको बताते हैं आखिरकार क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा, “हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होने पर व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है।” यह फैसला उन लोगों पर लागू होगा जो धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के लाभों का दावा करना चाहते हैं.
क्या है पूरा फरवरी?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सांविधानिक आदेश, 1950 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होता है, तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है. अदालत ने कहा कि यह नियम स्पष्ट है कि अगर कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म में जाता है, तो वह अपने जन्म के आधार पर भी अनुसूचित जाति का लाभ नहीं ले सकता.

इस फैसले के पीछे का तर्क यह है कि अनुसूचित जाति का दर्जा और उसके लाभ केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों के लिए हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े है. अगर कोई व्यक्ति इन धर्मों से बाहर जाता है, तो वह इस श्रेणी से बाहर हो जाता है.
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति का है जिसने ईसाई धर्म अपनाया और अब पादरी के रूप में काम कर रहा है.उसने कुछ लोगों के खिलाफ एससी-एसटी (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत मामला दर्ज कराया, जिसमें उसने अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में संरक्षण की मांग की.हालांकि, जिन लोगों पर आरोप लगाया गया था, उन्होंने इस मामले को चुनौती दी और कहा कि पीड़ित ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुका है, इसलिए वह एससी-एसटी कानून के तहत लाभ का हकदार नहीं है.

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2025 को फैसला सुनाया कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होने के कारण, पीड़ित व्यक्ति एससी-एसटी कानून के तहत लाभ नहीं ले सकता. इसके बाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को हटाने का आदेश दिया. इस फैसले के खिलाफ पादरी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की.
सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस मामले में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि अपीलकर्ता ने ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में वापस आने की कोशिश की है या नहीं, या उसे उसके मूल समुदाय ने स्वीकार किया है या नहीं. बल्कि सबूतों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन कर रहा है और एक दशक से अधिक समय से पादरी के रूप में काम कर रहा है. वह गांव में रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित करता है, जिससे यह स्पष्ट है कि घटना के समय वह ईसाई था.
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