Thursday, February 5, 2026

ISRO ने रचा इतिहास! 1600 किलो वजन वाले संचार उपग्रह LVM3-M6 को किया लान्च

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ISRO:इसरो ने फिर से इतिहास बना दिया है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 6100 किलो वजनी ब्लूबर्ड-2 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. यह मिशन इंटरनेट और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने जा रहा है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इस मिशन की सफलता के लिए देशवासियों और इसरो की टीम को बधाई दी है.यह मिशन “न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड'” (NSIL) और अमेरिका की एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच हुए समझौते के तहत लॉन्च किया गया है.

ISRO (photo credit -google)

इसरो ने रच डाला इतिहास

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इतिहास रच डाला है.भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने अपने साल के आखिरी मिशन में सबसे भारी संचार उपग्रह ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. यह पूरी तरह से वाणिज्यिक लॉन्चिंग थी, जिसमें अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के 6100 किलो वजनी ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 संचार उपग्रह को 520 किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी की निचली कक्षा में 16 मिनट में स्थापित किया गया.इसरो ने इस मिशन के लिए अपने एलवीएम3 रॉकेट का इस्तेमाल किया, जिसे इसकी शक्तिशाली क्षमताओं के कारण “बाहुबली” रॉकेट कहा जाता है.यह इस लॉन्च व्हीकल की छठवीं उड़ान भरी थी और वाणिज्यिक मिशन के लिए तीसरी. इस मिशन की सफलता से भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ने अपनी क्षमताओं का फिर से परिचय दिया है.

ISRO (photo credit -google)

पीएम ने पोस्ट कर जताई खुशी

प्रधानमंत्री मोदी ने इसरो की सफल लॉन्चिंग पर अपनी खुशी जाहिर की है. उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “भारत के युवाओं की ऊर्जा से, हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम और भी आधुनिक और प्रभावशाली बन रहा है.LVM3 ने अपनी विश्वसनीय हैवी-लिफ्ट क्षमता का प्रदर्शन किया है, जिससे हम गगनयान जैसे भविष्य के मिशनों के लिए मजबूत आधार बना रहे हैं, वाणिज्यिक लॉन्च सेवाओं का विस्तार कर रहे हैं और वैश्विक साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं. यह बढ़ी हुई क्षमता और आत्मनिर्भरता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शानदार भविष्य का संकेत है.”

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट क्यों है खास?

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट एक अगली पीढ़ी की तकनीक का हिस्सा है, जो 4जी (4G) और 5जी (5G) स्मार्टफोन पर सीधे हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करेगी. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए किसी अतिरिक्त एंटीना या हार्डवेयर की जरूरत नहीं होगी.

इस सैटेलाइट के सफल होने से मोबाइल टावर की जरूरत कम हो जाएगी, जिससे दूरस्थ इलाकों जैसे पहाड़ी क्षेत्रों, महासागरों और रेगिस्तानों में भी मोबाइल सेवा पहुंच सकेगी. इसके अलावा, आपदा की स्थिति में जब टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर तहस-नहस हो जाता है, तब भी यह सैटेलाइट नेटवर्क काम करता रहेगा.

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