Bangladesh: तारिक रहमान ने चार साल के निर्वासन और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए बीएनपी को एकजुट किया और युवा मतदाताओं में नई ऊर्जा भर दी.उनकी रणनीतिक क्षमता और करिश्माई नेतृत्व ने 2026 के आम चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई.आज वह बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे, जो देश में नए राजनीतिक युग की शुरुआत का संकेत है.
तारिक रहमान लेंगे शपथ
बांग्लादेश की राजनीति में आज एक नया अध्याय खुल रहा है. 35 साल बाद देश को एक नया प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है, जो पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और दिवंगत खालिदा जिया के विचारों से अलग एक नई दिशा दिखाएगा. तारिक रहमान का यह सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने चार साल के निर्वासन और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए बीएनपी को मजबूत किया और युवा मतदाताओं को आकर्षित किया.

तारिक रहमान ने चार साल के निर्वासन और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए बीएनपी को एकजुट किया और युवा मतदाताओं में नई ऊर्जा भर दी. उनकी रणनीतिक क्षमता और करिश्माई नेतृत्व ने 2026 के आम चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई.आज वह बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे, जो देश में नए राजनीतिक युग की शुरुआत का संकेत है.
तारिक रहमान का राजनीतिक करियर
बांग्लादेश की राजनीति में आज एक नया अध्याय खुल रहा है. 35 साल बाद देश को एक नया प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है, जो पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और दिवंगत खालिदा जिया के विचारों से अलग एक नई दिशा दिखाएगा.तारिक रहमान का यह सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने चार साल के निर्वासन और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए बीएनपी को मजबूत किया और युवा मतदाताओं को आकर्षित किया.

बांग्लादेश की राजनीति में आज एक नया दौर शुरू हो रहा है.35 साल बाद देश को एक नया प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है, जो पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और दिवंगत खालिदा जिया के विचारों से अलग एक नई दिशा दिखाएगा.तारिक रहमान का यह सफर आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने चार साल के निर्वासन और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए बीएनपी को मजबूत किया और युवा मतदाताओं को आकर्षित किया. साल 2026 के आम चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने उनकी रणनीतिक क्षमता और करिश्माई नेतृत्व को साबित किया.आज तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे, जो उनकी राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है.
साल 2002 में बनें वरिष्ठ नेता
तारिक रहमान का राजनीतिक सफर उनके परिवार की विरासत से जुड़ा है. साल 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान वे केवल चार साल के थे और कुछ समय के लिए हिरासत में भी रहे, जिससे उनकी पार्टी बीएनपी उन्हें युद्ध के सबसे कम उम्र के बंदियों में शामिल मानती है.उनकी राजनीतिक पहचान इसी पारिवारिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है, और छोटे उम्र में संघर्ष ने उन्हें बांग्लादेश की राजनीति का एक प्रमुख चेहरा बना दिया.तारिक रहमान ने 2001 में 35 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और 2002 में बीएनपी में वरिष्ठ पद हासिल किया. उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता को विपक्ष ने भाई-भतीजावाद कहा, लेकिन वे संगठनात्मक रणनीतिकार और सख्त नेतृत्व के लिए जाने गए.औपचारिक पद नहीं होने के बावजूद, उन्होंने पार्टी पर मजबूत पकड़ बनाई और कार्यवाहक अध्यक्ष बने.खालिदा जिया के निधन के बाद, वे बीएनपी के अध्यक्ष बने.

तारिक रहमान का सफर आसान नहीं रहा, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति दशकों से दो मुख्य पारिवारिक-राजनीतिक धारणाओं के बीच घूमती रही है – शेख हसीना और दिवंगत खालिदा जिया की विरासत के बीच.ऐसे में बीएनपी की जीत और तारिक रहमान की उभरती भूमिका एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत है.तारिक रहमान एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं.उनके पिता जिया उर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी साल 1981 में हत्या हो गई थी.उनकी मां बेगम खालिदा जिया दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं और बीएनपी की प्रमुख चेयरपर्सन थी. तारिक ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपने परिवार की राजनीति से की और बीएनपी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
विवाद और कानूनी मामले
तारिक रहमान पर अवामी लीग शासन के दौरान कई कानूनी मामले दर्ज किए गए, जिनमें भ्रष्टाचार, धन शोधन, अवैध संपत्ति और शेख हसीना की हत्या की साजिश शामिल हैं.उन्हें अनुपस्थिति में दोषी ठहराया गया और 17 महीनों तक हिरासत में रखा गया. रहमान ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया और जेल में मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया.उन्हें साल 2007 में भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.तारिक रहमान 2008 में अवामी लीग की जीत के बाद इलाज के लिए लंदन चले गए और करीब 17 साल वहीं रहे. उन्होंने पार्टी की रणनीति और संगठन पर नियंत्रण बनाए रखा, जो दक्षिण एशियाई राजनीति में असामान्य है. दिलचस्प बात यह है कि तारिक रहमान कभी राष्ट्रीय संसद के सदस्य नहीं रहे, लेकिन उनका प्रभाव संगठनात्मक नियंत्रण, पारिवारिक विरासत और पार्टी नेतृत्व से आया.उन्हें “डार्क प्रिंस” का उपनाम बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के जमात-ए-इस्लामी के साथ सत्ता में रहने के दौरान मिला.
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